मेवाड़ के महाराणा सज्जनसिंह जी (शासनकाल 1874-1884)
महान इतिहासकार डॉक्टर ओझा जी ने लिखा है कि “महाराणा राजसिंह के बाद मेवाड़ का सर्वाधिक उद्धार करने वाले शासक महाराणा सज्जनसिंह हुए।”
जनता के लिए अनेक उपयोगी निर्माण कार्यों के द्वारा महाराणा ने जनता का दिल जीत लिया था। इनके देहांत पर समूचा मेवाड़ रो पड़ा था।
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राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची माता का इतिहास ( History of Nagnechi Mata )
नागणेची माता का पूरा इतिहास
राठौड़ों की कुलदेवी कौन है
Nagnechiya Mata is kuldevi of all Rathore Rajputs.नागणेची माता इतिहास
राठौड़ वंश में कुलदेवी के रूप में नागणेचियां माता जी पूजित है। परम्परा से पूर्व में राठेश्वरी, चक्रेश्वरी, पंखिणी आदि नामों से राठौड़ों द्वारा पूजा जाता रहा है। भारत में शक्ति की उपासना प्राचीनकाल से ही अनवरत चली आ रही है।
नागणेची माता का मंदिर कहां स्थित है

Nagnechiya Mata is kuldevi of all Rathore
Nagnechiya Mata is kuldevi of all Rathore Rajputs. Main temple of Mata Nagnechiya is located in village Nagana near Jodhpur in Pachpadra tehsil. राजस्थान के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी चक्रेश्वरी, राठेश्वरी, नागणेची या नागणेचिया के नाम से प्रसिद्ध है । नागणेचिया माता का मन्दिर राजस्थान में जोधपुर जिले के नागाणा गांव में स्थित है। यह मन्दिर जोधपुर से 96 किमी. की दूरी पर है। प्राचीन ख्यातों और इतिहास ग्रंथों के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ राज्य के संस्थापक राव सिन्हा के पौत्र राव धूहड़ (विक्रम संवत 1349-1366) ने सर्वप्रथम इस देवी की मूर्ति स्थापित कर मंदिर बनवाया ।
नागणेची माता का पूरा इतिहास
Naganechi mata mandir ka video
जोधपुर के संस्थापक राव जोधा ने राठौड़ों की कुलदेवी माता नागणेच्या मूर्ति की स्थापना विक्रम संवत 1523 में मेहरानगढ़ में की थी। जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि ‘राव धुहड़ विक्रम संवत 1248 ज्येष्ठ सुदी तेरस ने कर्नाटक देश सूं कुल देवी चक्रेश्वरी री सोना री मूरत लाय न गांव नागाणे थापत किवी। तिनसु नागणेची कहाई।’ मूर्ति में सिंह पर सवार मां नागणेच्या के मस्तक पर नाग फ न फैलाए हैं। माता के हाथों में शंख चक्र आदि हैं। नागणेच्या माता को मंशा देवी, राठेश्वरी, पंखणी माता के नाम से भी संबोधित किया गया है।Nagnechya Mata
मेहरानगढ़ के जनाना महल में प्रवेश करते समय दायीं तरफ माता नागणेच्याजी का मंदिर बना हुवा है इतिहास के पन्नों में राठौड़ों का मारवाड़ आगमन 13वीं शताब्दी के मध्य माना गया है। प्राचीन ख्यातों और इतिहास ग्रंथों के अनुसार मारवाड़ के राठौड़ राज्य के संस्थापक राव सिन्हा के पौत्र राव धूहड़ (विक्रम संवत 1349-1366) ने सर्वप्रथम इस देवी की मूर्ति स्थापित कर मंदिर बनवाया, नागणेचिया माता का मन्दिर राजस्थान में जोधपुर जिले के नागाणा गांव में स्थित है। यह मन्दिर जोधपुर से 96 किमी. की दूरी पर है।
नागणेची माता का जन्म कब हुआ?

जोधपुर राज्य की ख्यात में लिखा है कि ‘राव धुहड़ विक्रम संवत 1248 ज्येष्ठ सुदी तेरस ने कर्नाटक देश सूं कुल देवी चक्रेश्वरी री सोना री मूरत लाय न गांव नागाणे थापत किवी। तिनसु नागणेची कहाई।
नागणेची माता की उत्पत्ति कैसे हुई?

राव धुहडजी ने होनी को नमस्कार किया और उसी अर्ध प्रकट मूर्ति के लिए सन् 1305, माघ वदी दशम सवत् 1362 ई. में मन्दिर का निर्माण करवाया। चक्रेश्वरी माता नागाणा में मूर्ति रूप में प्रकटी, अतः वह नागणेची रूप में प्रसिद्ध हुई।
राठौड़ वंश की कुलदेवी कौन है?

इन रणबंका राठौड़ो की कुलदेवी “ नागणेची “ है। देवी का ये “ नागणेची “ स्वरुप लौकिक है। ‘नागाणा ‘ शब्द के साथ ‘ ची ‘ प्रत्यय लगकर ‘ नागणेची ‘ शब्द बनता है , किन्तु बोलने की सुविधा के कारण ‘ नागणेची ‘ हो गया।
नागणेची माता का मेला कहाँ लगता है?

अठारह भुजायुक्त नागणेची माता के नागाणा स्थित इस मन्दिर में माघ शुक्ल सप्तमी और भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को प्रतिवर्ष मेला लगता है। और लापसी, खाजा का भोग लगता है। सप्त धागों को कुंकुम रंजित कर माता का प्रसाद मानकर सभी राखी बांधते हैं। श्री नागणेची माता के मन्दिर जालोर, जोधपुर, बीकानेर आदि के किलों में भी है।
नागणेची माता कौन थी?

नागणेच्या माँ (नागणेची मां) सूर्यवंशी राठौड़ राजपूतों की एक कुलदेवी है। इतिहास के अनुसार राव शिओजी के पोत्र राव दूहड़ एक बार कन्नौज गए जहां पर राठौड़ राज करते थे। और इन्होंने राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में नागणेच्या मां के मन्दिर की स्थापना की थी।
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jai mata ji ki sa
Rj Deependra
Mohangarh durg Jeslmer
मोहनगढ़ दुर्ग (जैसलमेर)
यह दुर्ग भारत के सबसे अंत में बने दुर्गों में से एक है, इसलिए इसे जवान किला भी कहते हैं।
मोहनगढ़ दुर्ग का निर्माण जैसलमेर महारावल जवाहरसिंह जी भाटी के शासनकाल में हुआ।
किले की नींव महाराजकुमार गिरधर सिंह जी भाटी ने रखी थी।
महारावल जवाहरसिंह जी ने इस किले का निर्माण अपने पुत्र महाराज हुकुम सिंह जी के लिए करवाया था।

मेवाड़ का वीर योद्धा महाराणा प्रताप। 2020 maharana pratap history in hindi ।
मेवाड़ का वीर योद्धा महाराणा प्रताप
maharana pratap history in hindi
जन्म : महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई, 1540 ईस्वी को राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। लेकिन उनकी जयंती हिन्दी तिथि के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल तृतीया को मनाई जाती है। उनके पिता महाराजा उदयसिंह और माता राणी जीवत कंवर थीं। वे राणा सांगा के पौत्र थे। महाराणा प्रताप को बचपन में सभी ‘कीका’ नाम लेकर पुकारा करते थे। महाराणा प्रताप की जयंती विक्रमी संवत कैलेंडर के अनुसार प्रतिवर्ष ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाई जाती है।
राज्याभिषेक : महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुंदा में हुआ था। राणा प्रताप के पिता उदयसिंह ने अकबर से भयभीत होकर मेवाड़ त्याग कर अरावली पर्वत पर डेरा डाला और उदयपुर को अपनी नई राजधानी बनाया था। हालांकि तब मेवाड़ भी उनके अधीन ही था। महाराणा उदयसिंह ने अपनी मृत्यु के समय अपने छोटे पुत्र को गद्दी सौंप दी थी जोकि नियमों के विरुद्ध था। उदयसिंह की मृत्यु के बाद राजपूत सरदारों ने मिलकर 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 अर्थात 1 मार्च 1576 को महाराणा प्रताप को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया।

उनके राज्य की राजधानी उदयपुर थी। राज्य सीमा मेवाड़ थी। 1568 से 1597 ईस्वी तक उन्होंने शासन किया। उदयपुर पर यवन, तुर्क आसानी से आक्रमण कर सकते हैं, ऐसा विचार कर तथा सामन्तों की सलाह से प्रताप ने उदयपुर छोड़कर कुम्भलगढ़ और गोगुंदा के पहाड़ी इलाके को अपना केन्द्र बनाया। कुल देवता : महाराणा प्रताप उदयपुर, मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश के राजा थे। उनके कुल देवता एकलिंग महादेव हैं। मेवाड़ के राणाओं के आराध्यदेव एकलिंग महादेव का मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है। एकलिंग महादेव महादेव का मंदिर उदयपुर में स्थित है। मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण करवाया और एकलिंग की मूर्ति की प्रतिष्ठापना की थी।
महाराणा प्रताप की शक्ति का परिचय…
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महाराणा प्रताप जिस घोड़े पर बैठते थे वह घोड़ा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ घोड़ों में से एक था। महाराणा प्रताप तब 72 किलो का कवच पहनकर 81 किलो का भाला अपने हाथ में रखते थे।भाला और कवच सहित ढाल-तलवार का वजन मिलाकर कुल 208 किलो का वजन उठाकर वे युद्ध लड़ते थे। सोचिए तब उनकी शक्ति क्या रही होगी। इस वजन के साथ रणभूमि में दुश्मनों से पूरा दिन लड़ना मामूली बात नहीं थी। अकबर ने की प्रताप की प्रशंसा…
मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने कई प्रयास किए। अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अन्य राजाओं की तरह उसके कदमों में झुक जाए। महाराणा प्रताप ने भी अकबर की अधीनता को स्वीकार नहीं किया था। अजमेर को अपना केंद्र बनाकर अकबर ने प्रताप के विरुद्ध सैनिक अभियान शुरू कर दिया। महाराणा प्रताप ने कई वर्षों तक मुगलों के सम्राट अकबर की सेना के साथ संघर्ष किया। मेवाड़ की धरती को मुगलों के आतंक से बचाने के लिए महाराणा प्रताप ने वीरता और शौर्य का परिचय दिया। प्रताप की वीरता ऐसी थी कि उनके दुश्मन भी उनके युद्ध-कौशल के कायल थे। उदारता ऐसी कि दूसरों की पकड़ी गई मुगल बेगमों को सम्मानपूर्वक उनके पास वापस भेज दिया था। इस योद्धा ने साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया और जंगल के कंद-मूल खाकर लड़ते रहे। माना जाता है कि इस योद्धा की मृत्यु पर अकबर की आंखें भी नम हो गई थीं। अकबर ने भी कहा था कि आज मेरे बराबर मुकाबला करने वाला नहीं रहा हा यह भी सच है कि अकबर महाराणा प्रताप से बहुत डरता था इसी लिए कभी भी महाराणा प्रताप से युद्ध के लिए स्वेम कभी नहीं गया था हल्दी घाटी का विश्वप्रसिद्ध युद्ध…

मेवाड़ पर आक्रमण : अपनी विशाल मुगलिया सेना, बेमिसाल बारूदखाने, युद्ध की नवीन पद्धतियों के जानकारों से युक्त सलाहकारों, गुप्तचरों की लंबी फेरहिस्त, कूटनीति के उपरांत भी जब तुर्क बादशाह अकबर समस्त प्रयासों के बाद भी महाराणा प्रताप को झुकाने में असफल रहा तो उसने आमेर के महाराजा भगवानदास के भतीजे कुंवर मानसिंह को महाराणा प्रताप को समझाने हेतु मेवाड़ भेजा! मानसिंह ने उन्हें अकबर की अधीनता स्वीकार करने की सलाह दी, लेकिन प्रताप ने दृढ़तापूर्वक अपनी स्वाधीनता बनाए रखने की घोषणा की और युद्ध में सामना करने की घोषणा भी कर दी। मानसिंह के मेवाड़ से खाली हाथ आ जाने को बादशाह ने करारी हार के रूप में लिया तथा अपनी विशाल मुगलिया सेना को मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेज दिया। आखिरकार 30 मई ई.सं. 1576, बुधवार के दिन प्रातःकाल में हल्दी घाटी के मैदान में विशाल मुगलिया सेना और रणबांकुरी मेवाड़ी सेना के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया। https://youtu.be/aLc3qyCMpDg मुगलों की विशाल सेना टिड्डी दल की तरह मेवाड़-भूमि की ओर उमड पड़ी। उसमें मुगल, राजपूत और पठान योद्धाओं के साथ जबरदस्त तोपखाना भी था। अकबर के प्रसिद्ध सेना पति महावत खां, आसफ खां, महाराजा मानसिंह के साथ शाहजादा सलीम (जहांगीर) भी उस मुगल वाहिनी का संचालन कर रहे थे, जिसकी संख्या इतिहासकार 80 हजार से 1 लाख तक बताते हैं।

इस युद्ध में प्रताप ने अभूतपूर्व वीरता और साहस से मुगल सेना के दांत खट्टे कर दिए और अकबर के सैकड़ों सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। विकट परिस्थिति में झाला सरदारों के एक वीर पुरुष ने उनका मुकुट और छत्र अपने सिर पर धारण कर लिया। मुगलों ने उसे ही प्रताप समझ लिया और वे उसके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार उन्होंने राणा को युद्ध क्षेत्र से निकल जाने का अवसर प्रदान कर दिया। इस असफलता के कारण अकबर को बहुत गुस्सा आया। तब तुर्क बादशाह अकबर स्वयं विक्रम संवत 1633 में शिकार के बहाने इस क्षेत्र में अपने सैन्य बल सहित पहुंचे और अचानक ही महाराणा प्रताप सिंह पर धावा बोल दिया। प्रताप ने तत्कालीन स्थितियों और सीमित संसाधनों को समझकर स्वयं को पहाड़ी क्षेत्रों में स्थापित किया और लघु तथा छापामार युद्ध प्रणाली के माध्यम से शत्रु सेना को हतोत्साहित कर दिया। बादशाह ने स्थिति को भांपकर वहां से निकलने में ही समझदारी समझी। एक बार के युद्ध में महाराणा प्रताप ने युद्ध में अपने धर्म का परिचय दिया और युद्ध में एक बार शाही सेनापति मिर्जा खान के सैन्यबल ने जब समर्पण कर दिया था, तो उसके साथ में शाही महिलाएं भी थीं। महाराणा प्रताप ने उन सभी के सम्मान को सुरक्षित रखते हुए आदरपूर्वक मिर्जा खान के पास पहुंचा दिया। जहांगीर से युद्ध : बाद में हल्दी घाटी के युद्ध में करीब 20 हजार राजपूतों को साथ लेकर महाराणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80 हजार की सेना का सामना किया। इसमें अकबर ने अपने पुत्र सलीम (जहांगीर) को युद्ध के लिए भेजा था। जहांगीर को भी मुंह की खाना पड़ी और वह भी युद्ध का मैदान छोड़कर भाग गया। बाद में सलीम ने अपनी सेना को एकत्रित कर फिर से महाराणा प्रताप पर आक्रमण किया और इस बार भयंकर युद्ध हुआ। इस युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया था।

राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुगलों का मुकाबला किया, परंतु मैदानी तोपों तथा बंदूकधारियों से सुसज्जित शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित 22 हजार राजपूत सैनिकों में से केवल 8 हजार जीवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाए। महाराणा प्रताप को जंगल में आश्रय लेना पड़ा। महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का पराक्रम…
महाराणा प्रताप के सबसे प्रिय घोड़े का नाम ‘चेतक’ था। चेतक बहुत ही समझदार और स्थिति को पल में ही भांप जाने वाला घोड़ा था। उसने कई मौकों पर महाराणा प्रताप की जान बचाई थी। हल्दी घाटी युद्ध के दौरान प्रताप अपने पराक्रमी चेतक पर सवार हो पहाड़ की ओर जा रहे थे तब उनके पीछे दो मुगल सैनिक लगे हुए थे। चेतक ने तेज रफ्तार पकड़ ली, लेकिन रास्ते में एक पहाड़ी नाला बह रहा था। युद्ध में घायल चेतक फुर्ती से उसे लांघ गया, परंतु मुगल उसे पार न कर पाए। चेतक नाला तो लांघ गया, पर अब उसकी गति धीरे-धीरे कम होती गई और पीछे से मुगलों के घोड़ों की टापें भी सुनाई पड़ीं। उसी समय प्रताप को अपनी आवाज सुनाई पड़ी, ‘हो, नीला घोड़ा रा असवार।’ प्रताप ने पीछे मुड़कर देखा तो उसे एक ही अश्वारोही दिखाई पड़ा और वह था उनका भाई शक्ति सिंह। प्रताप के साथ व्यक्तिगत विरोध ने उसे देशद्रोही बनाकर अकबर का सेवक बना दिया था और युद्धस्थल पर वह मुगल पक्ष की तरफ से लड़ रहा था। जब उसने नीले घोड़े को बिना किसी सेवक के पहाड़ की तरफ जाते हुए देखा तो शक्ति सिंह भी चुपचाप उसके पीछे चल पड़ा था। लेकिन शक्ति सिंह ने दोनों मुगलों को मौत के घाट उतार दिया। जीवन में पहली बार दोनों भाई प्रेम के साथ गले मिले थे। इस बीच चेतक जमीन पर गिर पड़ा और जब प्रताप उसकी काठी को खोलकर अपने भाई द्वारा प्रस्तुत घोड़े पर रख रहा था, चेतक ने प्राण त्याग दिए। बाद में उस स्थान पर एक चबूतरा खड़ा किया गया, जो आज तक उस स्थान को इंगित करता है। महाराणा प्रताप का युद्ध के बाद जंगलों में बीता समय…

महाराणा प्रताप का हल्दी घाटी के युद्ध के बाद का समय पहाड़ों और जंगलों में ही व्यतीत हुआ। अपनी गुरिल्ला युद्ध नीति द्वारा उन्होंने अकबर को कई बार मात दी। महाराणा प्रताप चित्तौड़ छोड़कर जंगलों में रहने लगे। महारानी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और जंगल के पोखरों के जल पर ही किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफाएं ही अब उनका आवास थीं और शिला ही शैया थी। महाराणा प्रताप को अब अपने परिवार और छोटे-छोटे बच्चों की चिंता सताने लगी थी। मुगल चाहते थे कि महाराणा प्रताप किसी भी तरह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म अपना लें। इसके लिए उन्होंने महाराणा प्रताप तक कई प्रलोभन संदेश भी भिजवाए, लेकिन महाराणा प्रताप अपने निश्चय पर अडिग रहे। प्रताप राजपूत की आन का वह सम्राट, हिन्दुत्व का वह गौरव-सूर्य इस संकट, त्याग, तप में अडिग रहा। धर्म के लिए, देश के लिए और अपने सम्मान के लिए यह तपस्या वंदनीय है। कई छोटे राजाओं ने महाराणा प्रताप से अपने राज्य में रहने की गुजारिश की लेकिन मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने के लिए महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, वे महलों को छोड़ जंगलों में निवास करेंगे। स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंद-मूल और फलों से ही पेट भरेंगे, लेकिन अकबर का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करेंगे। जंगल में रहकर ही महाराणा प्रताप ने भीलों की शक्ति को पहचानकर छापामार युद्ध पद्धति से अनेक बार मुगल सेना को कठिनाइयों में डाला था। बाद में मेवाड़ के गौरव भामाशाह ने महाराणा के चरणों में अपनी समस्त संपत्ति रख दी। भामाशाह ने 20 लाख अशर्फियां और 25 लाख रुपए महाराणा को भेंट में प्रदान किए। महाराणा इस प्रचुर संपत्ति से पुन: सैन्य-संगठन में लग गए। इस अनुपम सहायता से प्रोत्साहित होकर महाराणा ने अपने सैन्य बल का पुनर्गठन किया तथा उनकी सेना में नवजीवन का संचार हुआ। महाराणा प्रताप सिंह ने पुनः कुम्भलगढ़ पर अपना कब्जा स्थापित करते हुए शाही फौजों द्वारा स्थापित थानों और ठिकानों पर अपना आक्रमण जारी रखा! मुगल बादशाह अकबर ने विक्रम संवत 1635 में एक और विशाल सेना शाहबाज खान के नेतृत्व में मेवाड़ भेजी। इस विशाल सेना ने कुछ स्थानीय मदद के आधार पर वैशाख कृष्ण 12 को कुम्भलगढ़ और केलवाड़ा पर कब्जा कर लिया तथा गोगुन्दा और उदयपुर क्षेत्र में लूट-पाट की। ऐसे में महाराणा प्रताप ने विशाल सेना का मुकाबला जारी रखते हुए अंत में पहाड़ी क्षेत्रों में पनाह लेकर स्वयं को सुरक्षित रखा और चावंड पर पुन: कब्जा प्राप्त किया। शाहबाज खान आखिरकार खाली हाथ पुनः पंजाब में अकबर के पास पहुंच गया। चित्तौड़ को छोड़कर महाराणा ने अपने समस्त दुर्गों का शत्रु से पुन: उद्धार कर लिया। उदयपुर को उन्होंने अपनी राजधानी बनाया। विचलित मुगलिया सेना के घटते प्रभाव और अपनी आत्मशक्ति के बूते महाराणा ने चित्तौड़गढ़ व मांडलगढ़ के अलावा संपूर्ण मेवाड़ पर अपना राज्य पुनः स्थापित कर लिया गया। इसके बाद मुगलों ने कई बार महाराणा प्रताप को चुनौती दी लेकिन मुगलों को मुंह की खानी पड़ी। आखिरकार, युद्ध और शिकार के दौरान लगी चोटों की वजह से महाराणा प्रताप की मृत्यु 29 जनवरी 1597 को चावंड में हुई।
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Nagnechiya Mata Nagana History : Kuldevi of Rathore
Kuldevi of Rathore Dynasty of Rajasthan is famous as the name Chakreshwari, Ratheswari, Naganechi / Nagnechiya Mata. The temple of Nagnechi Mata is located at Nagana village of Jodhpur district in Rajasthan. This temple is 96 km away from Jodhpur. According to ancient religious and historical texts, Rao Dhuhad (Vikram Samvat 1349-1366), grandson of Rao Sinha (founder of Rathore state in Marwar) first installed the statue of this Goddess and built the temple.

The Statue of Nagnechi Mata was brought from Karnataka
Raja Rao Dhuhad went to Konkan (Karnataka) in south and brought the statue of his Kuldevi Chakreshwari and established it in Nagana village about 50 km away from Pachapadra, and the Goddess became famous as Nagnechi Mata. Pachapadra, famous for salt, is the intermediate place of Barmer-Jodhpur road, near which (50 km) Goddess Temple is located in Nagana.
In earlier, Neem wood was not used in Jodhpur
The eighteen-armed Goddess ‘Nagnechi’ is the form of ‘Mahishmardini‘. Her symbol is ‘eagle’ which can be seen on the flags of Marwar (Jodhpur), Bikaner and Kishangarh principalities. The Goddess Nagnechi Devi was the Kuldevi of Jodhpur principality. Since the dwelling place of this Goddess was believed to be under Neem tree, hence the tree of Neem was favored in Jodhpur and its wood was not used.
The famous history of Nagnechi Mata Temple
Once in childhood, Rao Dhuad ji went to maternal home (Nanihal). There he saw the very big stomach of his uncle (Mama). Seeing the chunking stomach he can not stop his laughter and start laughing loudly. His uncle got angry at him and he told Rao Dhhud ji that ‘ You are laughing at my big stomach, but world laughs at your family seeing without Kuldevi (Clan Goddess). Your grandfather can not even bring the statue of Kuldevi with him, only then you can not have a permanent place.
Uncle’s words were stabbed in his heart
These bitter but true words of uncle were stabbed in the heart of Rao Dhuhd. At the same time, he decided that ‘I will bring the idol of my Kuldevi’. He came to the village near his father Rao Asthan ji. But child Dhuhad ji did not know who is their Kuldevi? where is her idol? And how can it be brought? He decided to please Goddess by performing austerities.
One day, child Rao Dhuhd ji left the house quietly and went to the forest. There, he started performing penance with sacrificing food & water. Finally, the goddess pleased due to his tenacity. Goddess appeared. Then the child Rao Dhuhad ji asked to the goddess, “Mother!” Who is my Kuldevi? And where is his idol? How can it be brought? Goddess affectionately said to him that ” Child! Your Kuldevi’s name is Chakreshwari and her idol is in Kannauj. You are a kid now, you will be able to go after being young. You have to wait.
Goddess Chakreshwari came in the form of a bird
After some years, Rao Asthanji’s passed away and Rao Dhuhad ji became the ruler of Khed. One day, Rao Dhuhad ji went to Kannauj accompanied by his Rajpurohit Pithad ji, . In Kanauj, he met Guru Lumba Rishi. The Rishi shown Dhuhad ji the statue of Chakreshwari Mata and said that this is your Kuldevi. You can take it with you.
When Rao Dhuhad ji started taking the statue of Goddess with him, then suddenly he heared the voice of Kuldevi – stop, son! I will not go with you like this. I will go with you as a ‘Pankhini’ (Bird). Then Rao Dhuhad ji said, “O mother, how can I believe that you are walking with me?” Then Shri Kuldevi Chakreshwari said that till you see me flying with you in the form of a bird, you should understand that your Kuldevi is with you. But be aware of one thing, do not stop anywhere on the way before reaching your destination.
When Dhuhad ji stayed before destination
Rao Dhuhad ji did the same as the order of Kuldevi. Rao Dhuhad ji was tired of reaching near ‘Nagana mountain’, so he sat down under a neem tree to relax. Due to excessive exhaustion, he got to sleep. When he woke up, then the ‘Pankhini'(Bird) was sitting on the neem tree.
Rao Dhuhad ji got up and ready to move forward, Kuldevi said, I had already said that wherever you stay I will also stop and will not move forward. Now I will not go ahead.
Then Rao Dhuhad ji said that what is the mother’s order for me now. Kuldevi said- In the morning, run your horse as far as possible before noon. The land as far as horse will run, will be my ‘Oran’, and here I will be appearing in the form of an idol. But be aware of one thing, when I appear, then tell herdsman that he should not call the cows, otherwise my idol would stop in middle.
The Idol got stuck up to the waist
Rao Dhuhad ji got up early in the next morning and ran his horse in four directions as his kuldevi said. He told herdsman to not make voices to stop cows, keep silent. wherever your cows go, I will bring them from there. Soon the thunder voices started from the mountain, and the lightning started shining. With this, the statue of Kuldevi started appearing from the land. herdsman’s cows started screaming in fear. At that time, by herdsman’s nature, the voice came out to stop the cows from the his mouth. Just because the voice of herdsman came out, the idol that appeared was stopped there.
The idol could come out up to the waist. Rao Dhuhad Ji accepted the fate and constructed the temple in 1305, the ”Magh Vadi 10, Samvat 1362 ”, for the semi-appearing idol. Because the “Chakreshwari” appeared as the idol in Nagana, she became famous as “Nagchechi Mata”. Thus, in the Marwar, Rathore caste’s Kuldevi is known as Nagnechi / Nagnechiya Mata In this temple situated in Nagana, fairs are organized every year on ‘Magh Shukla Saptami’ and ‘Bhadrapad Shukla Saptami’ there. Shri Nagnechiya Mata is offered ‘Lapsi’ and ‘Khaja’. The devotees color seven threads with ‘Kumkum’ and bind them as rakhi assuming the offerings of the Kuldevi Nagechiya.
The temples of Shri Nagnechi Mata are also situated in the forts of Jalore, Jodhpur, Bikaner etc. The Rathore kings used to build the temple of their Kuldevi in their own forts so that they could receive blessings by praying with devotion every day.
Nagnechi Mata Temple of Bikaner
In Bikaner, Nagnechi Mata Temple is located about 2 km away in the southeast of the city. This temple is built on a large and high platform, inside which the statue of eighteen-armed Nagnechi Mata made of silver is installed. This statue of ‘Naganechi ji’ was brought by the founder of Bikaner state Rao Bika with his other royal-symbols from his native state Jodhpur. This Nagnechiji is worshiped in Bikaner and nearby places. On the occasion of Navratri and Dussehra, huge masses come to the temple to worship the Goddess.
Note:- If you worship Nagnechi Mata as your Kuldevi, then please write your community and Gotra in the Comment Box.






